Friday, 14 August 2015

Forgotten Legends : 1.देश भक्त बटुकेश्वर दत्त

देशभक्त बटुकेश्वर दत्त बारे के मे बस सब को यहाँ तक ही पता है कि भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने असेंबली मे बम फोड़ा था | इसके अलावा काफी लोगो को इनके बारे मे कुछ पता नहीं | आइये जानते है इनके इनकी गुमनाम जिंदिगी के बारे मे |

आजादी की लड़ाई में हथियार उठाने के कारण उनके सगे भाई ने उन्हें घर से निकाल दिया था
और मृत्युपर्यन्त उनका कोई संपर्क न रहा| बटुकेश्वर ने 8 अप्रैल 1929 को जब दिल्ली की सेंट्रल असेंबली में भगत सिंह के साथ बम फेंका था तब वह सिर्फ 18 साल के ही थे।

इसके बाद लाहौर में बटुकेश्वर दत्त, भगत सिंह और यतींद्र नाथ ने 144 दिनों की हड़ताल की. इस दौरान यतींद्र नाथ की मौत हो गई थी| उनके साथी चंद्रशेखर आजाद, सुखदेव, राजगुरु आदि वतन के लिए शहीद होते गए।
भगत सिंह ने फांसी की सजा सुनने के बाद लाहौर सेंट्रल जेल से बटुकेश्वर को भेजे अपने आखिरी खत में लिखा था,

"तुम्हें आजीवन कारावास मिला है। तुम्हें जीवित रहकर दुनिया को दिखाना है कि क्रांतिकारी अपने आदर्र्शो
के लिए सिर्फ शहीद होकर ही नहीं, जीवित रहकर भी दुनिया की हर मुश्किल का जीवटता से सामना कर सकता है।"

बटुकेश्वर ने भगत सिंह के इस अटल विश्वास को ताजिदंगी कायम रखा। उन्होंने पहले तो जीवटतापूर्वक 10 साल अंडमान की नारकीय जेल में कालापानी की सजा काटी। जेल में ही उन्होंने 1933 और 1937 में ऐतिहासिक भूख हड़ताल की। सेल्यूलर जेल से 1937 में बांकीपुर केन्द्रीय कारागार, काला पानी से गंभीर बीमारी टी.बी. होजाने के कारण वे  पटना में लाए गए और 1938 में रिहा कर दिए गए।|

फिर 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन में भाग लिया, फिर गिरफ्तार कर लिए गए और चार वर्षों के बाद 1945 में रिहा किए गए।

लेकिन जिस देश के लिए उन्हानें अपना सब कुछ कुर्बान किया उसने भी उपेक्षा और तिरस्कार के ऐसे दंश उन्हें दिए जो अंग्रेजों की यातनाओं के निर्मम प्रहारों से भी अधिक मर्मभेदी थे।

दत्त के जीवन के इन अज्ञात पहलुओं का खुलासा नेशनल बुक ट्रस्ट द्वारा प्रकाशित किताब (बटुकेश्वर दत्त, भगत सिंह के सहयोगी) में हुआ है। अनिल वर्मा द्वारा लिखी गयी यह संभवत: पहली ऐसी किताब है, जो उनके जीवन का प्रामाणिक दस्तावेज होने के
साथ-साथ स्वतंत्रता संघर्ष और आजादी के बाद जीवन संघर्ष को उजागर करती है।

आजादी के बाद 18 नवंबर 1947 को जन्मदिवस के दिन ही उनका विवाह अंजलि देवी से हुआ। विवाह के बाद वे स्थायी रूप से पटना में ही बस गए थे। वह भी किराये के मकान में।
                                                                       

उन्होंने बिस्कुट, ब्रेड का एक छोटा सा कारखाना खोला, लेकिन उसमें काफी घाटा हो गया और जल्द ही बंद हो गया।कुछ समय तक टूरिस्ट एजेंट का काम भी किया।इस क्रांतिवीर को आजादी के बाद पेट भरने के लिए सिगरेट कंपनी के मामूली एजेंट के रूप में दर-दर की ठोकरें खानी पड़ीं।

किसी ने उन्हें बताया कि स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों को बस के परमिट दिए जा रहे हैं।
वे अपनी अर्जी ले कर आरटीओ अफसर के पास गए। उनसे पूछा गया आपके पास क्या प्रमाण है कि आप स्वतंत्रता संग्राम सेनानी रहे हैं?इस पर श्री दत्त ने कहा कि - आप हमारे बारे में जानते हैं तो ठीक है लेकिन मैं नकली प्रमाणपत्र धारको से अपने लिए देशभक्ति का प्रमाणपत्र मांगने नहीं जाऊँगा.बाद में जब डा. राजेन्द्र प्रसाद को इस घटना का पता चला तो उन्होंने उस कमिश्नर को बहुत फटकारा और श्री दत्त से माफ़ी मांगने को कहा|

बटुकेश्वर जी का बस इतना ही सम्मान हुआ कि पचास के दशक में उन्हें एक बार चार महीने के लिए विधान परिषद का सदस्य मनोनीत किया गया. पुराने ज़माने की जानीमानी 1965 में आई फिल्म "शहीद" भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम पर हिन्दी भाषा की फिल्म है। भगत सिंह के जीवन पर 1965 में बनी यह देशभक्ति की सर्वश्रेष्ठ फिल्म मानी गई है। इसकी कहानी स्वयं बटुकेश्वर दत्त ने लिखी थी।

उनकी संतान एक पुत्री थी , उनकी पुत्री बताती है कि पिताजी को देशवासियों की पीड़ा सहन नहीं होती थी़ एक बार पटना में उन्होंने भिखारी को कांपते देख अपनी कोट उतार कर दे दी़, जबकि वे खुद ठंड से कांपते हुए घर पहुंच़े| वे हमेशा से कहा करते थे कि अपना जीवन दूसरों की सेवा में लगाओ़|


बटुकेश्वर दत्त के 1964 में अचानक बीमार होने के बाद उन्हें गंभीर हालत में पटना के सरकारी अस्पताल में भर्ती कराया गया। इस पर उनके मित्र चमनलाल आजाद ने एक लेख में लिखा
"क्या दत्त जैसे कांतिकारी को भारत में जन्म लेना चाहिए? परमात्मा ने इतने महान शूरवीर को हमारे देश में जन्म देकर भारी भूल की है। खेद की बात है कि जिस व्यक्ति ने देश को स्वतंत्र कराने के लिए प्राणों की बाजी लगा दी और जो फांसी से बाल-बाल बच गया, वह आज नितांत दयनीय स्थिति में अस्पताल में पड़ा एडियां रगड़ रहा है और उसे कोई पूछने वाला नहीं है।यह विडंबना ही है कि स्वाधीन भारत में इस महान क्रांतिकारी को असहाय, निर्धनता और गुमनामी की जिंदगी नसीब हुई।"

इसके बाद सत्ता के गलियारों में हड़कंप मच गया और आजाद, केंद्रीय गृहमंत्री गुलजारी लाल नंदा और पंजाब के मंत्री भीमलाल सच्चर से मिले। पंजाब सरकार ने एक हजार रुपए का चेक बिहार सरकार को भेजकर वहां के मुख्यमंत्री केबी सहाय को लिखा कि यदि वे उनका इलाज कराने में सक्षम नहीं हैं तो वह उनका दिल्ली या चंडीगढ़ में इलाज का व्यय वहन करने को तैयार हैं।
बिहार सरकार की उदासीनता और उपेक्षा के कारण क्रांतिकारी बैकुंठनाथ शुक्ला पटना के सरकारी अस्पताल में असमय ही दम तोड़ चुके थे। अत: बिहार सरकार हरकत में आयी और पटना मेडिकल कॉलेज में ड़ॉ मुखोपाध्याय ने दत्त का इलाज शुरू किया। मगर उनकी हालत बिगड़ती गयी, क्योंकि उन्हें सही इलाज नहीं मिल पाया था और 22 नवंबर 1964 को उन्हें दिल्ली लाया गया।


दिल्ली पहुंचने पर उन्होंने पत्रकारों से कहा था, "मुझे स्वप्न में भी ख्याल न था कि मैं उस दिल्ली में जहां मैने बम डाला था, एक अपाहिज की तरह स्ट्रेचर पर लाया जाउंगा।"

उन्हें सफदरजंग अस्पताल में भर्ती किया गया। पीठ में असहनीय दर्द के इलाज के लिए किए जाने वाले कोबाल्ट ट्रीटमेंट की व्यवस्था केवल एम्स में थी, लेकिन वहां भी कमरा मिलने में देरी हुई। 23 नवंबर को पहली दफा उन्हें कोबाल्ट ट्रीटमेंट दिया गया और 11 दिसंबर को उन्हें एम्स में भर्ती किया गया।

बाद में पता चला कि दत्त बाबू को कैंसर है और उनकी जिंदगी के चंद दिन ही शेष बचे हैं। भीषण वेदना झेल रहे दत्त चेहरे पर शिकन भी न आने देते थे।

पंजाब के मुख्यमंत्री रामकिशन जब दत्त से मिलने पहुंचे और उन्होंने पूछ लिया, हम आपको कुछ देना चाहते हैं, जो भी आपकी इच्छा हो मांग लीजिए। छलछलाई आंखों और फीकी मुस्कान के साथ उन्होंने कहा, "हमें कुछ नहीं चाहिए। बस मेरी यही अंतिम इच्छा है कि मेरा दाह संस्कार मेरे मित्र भगत सिंह की समाधि के बगल में किया जाए।"

लाहौर षडयंत्र केस के किशोरीलाल अंतिम व्यक्ति थे जिन्हें उन्होंने पहचाना था। उनकी बिगड़ती हालत देखकर भगत सिंह की मां विद्यावती को पंजाब से कार से बुलाया गया जोकि बटुकेश्वर दत्त को अपना पुत्र मानती थी ।(भगत सिंह की माँ और बटुकेश्वर दत्त )
17 जुलाई को वह कोमा में चले गये और 20 जुलाई 1965 की रात एक बजकर 50 मिनट पर दत्त बाबू इस दुनिया से विदा हो गये। उनका अंतिम संस्कार उनकी इच्छा के अनुसार, भारत-पाक सीमा के करीब हुसैनीवाला में भगत सिंह, राजगुरू और सुखदेव की समाधि के निकट किया गया।

[मेरा मकसद केवल इतना है कि जन जन तक उन महान लोगो के बारे मे याद दिलाया जाए जिनको आजकल सब भूल चुके है| जिन्होंने कभी अपने लिए कुछ नहीं किया| किसी ने मुझसे एक बार पूछा था कि इन सब काम से क्या होगा(awareness फैलाना , मतलब आजकल जिनके पास खाली वक़्त है ये सब उनका काम है )? मेरा जवाब सीधा सा था जिन्होंने पूरी जिंदिगी लगा दी देश के लिए , देश के लोगो के लिए क्या हमारी ज़िम्मेदारी नहीं है कुछ उनके प्रति? उनकी पूरी जिंदिगी के आगे ये एक कण भर भी नहीं... जैसे बच्चे अपने माँ-बाप को नहीं भूलते ठीक इसी तरह देशवासी अपने देश के वीरो को नहीं भूल सकते| और अंत में ये कहूँगा की हमारी तरफ से इनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि येही होगी के हम लोग इनके बनाये हुए रास्ते पर चले और देश हित मे ही सोचे |
"जिसे हम आज जीते है, उसके लिए खून बहाया था"
                                                          -अनुभव सिंह चाहर]
"हम तो घर से ही थे निकले बाँधकर सर पर कफ़न,
जाँ हथेली पर लिये लो बढ चले हैं ये कदम.
जिन्दगी तो अपनी मॆहमाँ मौत की महफ़िल में है,
सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है"
                                                  - रामप्रसाद बिस्मिल
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source: wiki, bbc india, india news, biography "बटुकेश्वर दत्त, भगत सिंह के सहयोगी" written by Anil verma and published by national book trust.





भगत सिंह की माँ अस्पताल मे जब बटुकेश्वर दत्त से मिलने पहुची |




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